इजरायल और पलेस्टाइन की जंग की सच्चाई !

हमारे देश के लोग इजरायल और पलेस्टाइन की जंग में कट्टरता के साथ दो धडों में बंटे हुए हैं। धर्मों के हिसाब से भारतीय लोग हजारों किलोमीटर दूर दो देशों के आपसी तनाव में अपने-अपने धार्मिक कारणों के हिसाब से अलग अलग पालों में बंट गए हैं। और इन दोनों धड़ों में अलगाव इतना है कि कोई एक दूसरे की बातों को पसंद करना ही नहीं चाहता है। पसंद तो दूर कुछ जड़ लोग आवेशित होकर गाली गलौज में उतर आते हैं एक दूसरे की पोस्ट पर।किसी देश की नीति पसंद करना, देश के लोगों को पसंद करना, देश के राष्ट्रवाद को पसंद करना, एक अलग बात है लेकिन पूरी तरह से अंधभक्ति में आकर, बिना कोई उन देशों के तनाव का कारण जाने, दूसरे देश के सपोर्ट में कट्टरता के साथ उतर आना, ये केवल और केवल अंधभक्ति दर्शाता है वो भी उस देश के लिए जिसके बारे में उन्हें कोई नॉलेज ही ना हो।और अगर हजारों किलोमीटर दूर दो देशों की वजह से कुछ भारतीय आपस कलह बाजी कर लें तो ये बात कहां तक जायज़ है।इस बाजारवाद की दुनिया में कोई देश किसी का पूरी तरह से दोस्त नहीं होता और ना कोई कोई दुश्मन होता है। देशों के रिलेशन डिप्लोमेटिक एजेंडे पर चलते हैं ना कि इमोश्नल एंगल पर। और इसका जीता जागता उदाहरण अमेरिका, ब्रिटेन हैं। इन जैसे डेवलप्ड , समझदार, और चालक देश अपने बिजनेस के हिसाब से देशों को सपोर्ट करते हैं। इनके लिए कोई इजरायल नहीं और कोई फिलिस्तीन नहीं। जहां बिजनेस उसके कभी यार या कभी मूर्ख बनाने की चाल और या कभी दोस्त।हमारे देश की सरकारें भी यही करती अाई हैं अभी तक। और इस बार भी हमारे देश की सरकार किसी भी देश के पूरी तरह से समर्थन में नहीं उतरी। बल्कि ह्यूमनिटी के नाते, फिलिस्तीनी नागरिकों के राइट का समर्थन किया, जिनकी जमीन इजरायल ने हड़प ली और युद्ध में मारे गए बच्चों और महिलाओं की कठोर रूप से निंदा की।पर हम भारतीय आपस में ही दुश्मनी मानकर बैठ गए हैं। बात ये है कि बाहरी देशों के मसले पर हमारे देश की सरकार और विदेश मंत्रालय को ही छोड़ दीजिए और एक आम आदमी की तरह युद्ध को ख़तम करने की बात पर तवज्जो दीजिए। क्योंकि कब कौन देश किसी का दुश्मन दोस्त बन जाए अाम नागरिक नहीं जानता।

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